पारिजात
आश्विन (क्वाँर) का महीना है। दिन सप्तपर्णी की खुशबू में भीगे रहते हैं, और रातें पारिजात की ठंडी हवा के झोंकों से सिहरती हैं। सप्तपर्णी की खुशबू तेज़ है, दूर से ही अपने होने का पता दे देती है। पारिजात की खुशबू एकदम मद्धम है, पास होकर भी बस हवा के हल्के झोंके में महसूस होती है। मुझे तो पारिजात पसंद है। शांत, पर दिल में बस जाने वाला। झोंका चला जाता है, पर वो खुशबू देर तक साथ रहती है। ज़िंदगी के सारे खूबसूरत पल भी पारिजात जैसे ही हैं। आलसी दोपहर-से सुकून भरे, पर बिना शोर के। ढलान पर तेज़ भागती साइकिल में उड़ती शर्ट जैसे। पार्क की बेंच पर पहले क्रश के साथ बैठने जैसे। मम्मी-पापा और भाई के साथ एक ही बाइक पर मेला देखने जाने जैसे। हॉस्टल की छत पर दोस्तों के साथ घंटों बैठे रहने जैसे। अव्यान के साथ बेमतलब की बातों जैसे। सौम्या के साथ संडे की दाल-बाटी जैसे। पारिजात जैसे पलों को खोजना नहीं पड़ता। वो बस आ जाते हैं, किसी क्वाँर के महीने में, किसी हवा के झोंके के साथ। और खुशी-खुशी हमेशा साथ रह जाते हैं। शर्त बस इतनी है कि उन्हें पकड़ने की कोशिश न करो।